माँ शब्द तो छोटा सा है पर इसकी व्याख्या इतनी विशाल है की कई हज़ार पन्नों में भी पूरी नही समां सकती ।मैंने बचपन में अपनी माँ से सुना था कि ' माँ कहना आसान है , कहलाना मुश्किल ।' तब अजीब लगता था । समझ ही नहीं पाते थे कि घर कि सबसे सुप्रीम पावर होते हुए भी बार -बार वो ऐसा क्यूं कहती रहती हैं ।
आज जब मैं खुद दो बच्चो की माँ हूँ तो कुछ-कुछ उस कथन का मर्म समझ पाती हूँ । नवजात शिशु के रोने पर उसकी तकलीफ् न समझ पाना , उसके बार -बार गिरने पर होने वाला दर्द महसूस करना , पहली बार स्कूल भेजकर उसका इन्तजार करना , परिक्षा के समय उनके साथ सारी -सारी रात जागना , नौकरी या शादी के लिए घर से विदा करना , जैसी कई परिस्थितियों से गुजरते हुई ये एहसास होता है कि माँ सिर्फ कहलाने का एक शब्द मात्र नहीं है बल्कि एक पूरा नया जीवन है । इस जीवन में माँ एक गुरु है , मित्र है , डॉक्टर है , गाइड है और कभी -कभी अकेलेपन की वह साथी भी जिसके साथ कभी भी , कुछ भी बांटा जा सकता है । बच्चो की किशोरावस्था जितनी उनके लिए मुश्किल होती है, उससे कई गुना माँ -बाप के लिए । खासकर माँ के लिए , क्योंकि कुछ भी अच्छा न होने पर इल्जाम माँ पर ही लगता है कि "माँ ने कुछ सिखाया नहीं क्या ' ?
माँ की महत्ता और महानता को इंसान तो क्या ईश्वर ने भी स्वीकार किया है । उसके आँचल से लेकर क़दमों तक में जन्नत होने का दावा तो सदियों से किस्सों, कहानियों , कविताओं और गीतों आदि में किया जाता रहा है परन्तु आजकल शायद सोच में बहुत बदलाव आया है । अब पढी़-लिखी व आधुनिक माँ तो चलती है लेकिन कम पढी -लिखी व सीधी-सादी माँ को सबसे मिलाने में शरम महसूस होने लगी है । बुढापा आते-आते यही गोद व आँचल छाया नहीं बल्कि बोझ लगने लगे हैं । तभी तो आजकल अधिकतर बूढे़ माँ-बाप या तो एकाकी जीवन व्यतीत कर रहें हैं अथवा वृद्धाश्रमों में । क्या पर्याप्त समय का न होना या विचारों का न मिलना , ये कारण काफ़ी है माँ - बाप से दूर होने के लिए ? क्या हम उनकी डाँट को बीवी या बॉस की डाँट समझकर सहन नहीं कर सकते । ऐसी डाँट जिसे वे खुद ही कुछ समय बाद भूल चुके होते हैं ।
उनकी जि़म्मेदारी उठाना इतना भी भारी नहीं कि हमारे कंधे झुकने लगें । मेरा अनुभव कहता है की हो सकता है कि सामंजस्य बिठाने में कुछ समय लगे पर सच मानिए हम सभी ऐसा कर सकते हैं और इसका दूरगामी परिणाम अच्छा और सुखद ही होगा न केवल हमारे बढ़ों के लिए, हमारे बच्चों के लिए बल्कि हमारे अपने लिए भी । तो आइए ' विमैन्स डे' मनाने से पहले अपने घर की उस वुमन को उसका उचित मान- सम्मान व स्थान देने का प्रयास करें , जिसे हमें इस दुनिया में लाने का श्रेय जाता हैै । आशा करती हूँ एक कोशिश तो सभी करेंगें । धन्यवाद ।