सोमवार, 7 मार्च 2016

माँ

माँ  शब्द  तो  छोटा  सा  है  पर  इसकी  व्याख्या  इतनी  विशाल  है  की  कई  हज़ार  पन्नों  में  भी  पूरी  नही समां  सकती ।मैंने  बचपन  में  अपनी  माँ  से  सुना  था  कि  ' माँ  कहना  आसान  है  , कहलाना  मुश्किल ।'  तब  अजीब  लगता  था  ।  समझ  ही  नहीं  पाते  थे  कि  घर  कि  सबसे  सुप्रीम  पावर  होते  हुए  भी  बार -बार  वो  ऐसा  क्यूं  कहती  रहती  हैं ।
                   आज  जब  मैं  खुद  दो  बच्चो  की  माँ  हूँ  तो  कुछ-कुछ  उस  कथन  का  मर्म  समझ  पाती  हूँ ।  नवजात  शिशु  के  रोने  पर  उसकी तकलीफ् न  समझ  पाना , उसके  बार -बार  गिरने  पर  होने  वाला  दर्द महसूस  करना , पहली  बार  स्कूल  भेजकर  उसका  इन्तजार  करना , परिक्षा  के  समय  उनके  साथ  सारी -सारी  रात  जागना ,  नौकरी  या  शादी  के  लिए  घर  से  विदा  करना , जैसी  कई  परिस्थितियों से  गुजरते  हुई  ये  एहसास  होता  है  कि  माँ  सिर्फ  कहलाने  का  एक  शब्द  मात्र  नहीं  है  बल्कि  एक  पूरा नया  जीवन  है ।  इस  जीवन  में  माँ  एक  गुरु  है , मित्र है , डॉक्टर  है , गाइड  है  और  कभी -कभी  अकेलेपन  की  वह  साथी  भी  जिसके  साथ  कभी  भी , कुछ  भी  बांटा  जा  सकता  है । बच्चो  की  किशोरावस्था  जितनी  उनके  लिए  मुश्किल  होती  है,  उससे  कई  गुना  माँ -बाप  के लिए । खासकर  माँ के  लिए , क्योंकि  कुछ  भी  अच्छा   न  होने  पर  इल्जाम  माँ  पर  ही  लगता  है  कि  "माँ  ने  कुछ  सिखाया  नहीं  क्या ' ?
माँ  की  महत्ता  और  महानता  को  इंसान  तो क्या  ईश्वर  ने  भी  स्वीकार  किया  है  । उसके  आँचल  से  लेकर  क़दमों  तक  में  जन्नत होने  का  दावा तो सदियों से  किस्सों, कहानियों ,  कविताओं और  गीतों आदि  में किया जाता रहा है परन्तु  आजकल  शायद  सोच  में  बहुत  बदलाव  आया है ।  अब  पढी़-लिखी  व  आधुनिक माँ  तो  चलती है लेकिन  कम  पढी -लिखी  व  सीधी-सादी  माँ  को  सबसे  मिलाने  में शरम  महसूस  होने  लगी  है ।  बुढापा  आते-आते यही गोद व आँचल  छाया  नहीं  बल्कि  बोझ लगने लगे हैं । तभी  तो आजकल  अधिकतर  बूढे़ माँ-बाप  या  तो  एकाकी  जीवन  व्यतीत  कर  रहें  हैं  अथवा  वृद्धाश्रमों में ।  क्या  पर्याप्त समय का न होना या विचारों का न मिलना ,  ये  कारण  काफ़ी है  माँ - बाप से दूर  होने  के  लिए ?  क्या  हम  उनकी डाँट  को  बीवी या बॉस  की  डाँट  समझकर  सहन  नहीं कर  सकते ।  ऐसी डाँट  जिसे  वे  खुद  ही  कुछ  समय  बाद  भूल  चुके  होते  हैं ।

उनकी  जि़म्मेदारी  उठाना  इतना  भी भारी  नहीं कि  हमारे  कंधे  झुकने  लगें ।  मेरा अनुभव  कहता  है  की हो सकता है  कि  सामंजस्य  बिठाने में  कुछ  समय  लगे  पर  सच  मानिए  हम  सभी  ऐसा  कर  सकते  हैं  और  इसका  दूरगामी  परिणाम  अच्छा  और  सुखद  ही होगा न  केवल  हमारे  बढ़ों  के  लिए, हमारे  बच्चों  के  लिए  बल्कि  हमारे  अपने  लिए  भी ।  तो  आइए  ' विमैन्स डे'  मनाने  से  पहले  अपने  घर   की  उस  वुमन  को  उसका  उचित  मान- सम्मान व स्थान  देने  का  प्रयास  करें  ,  जिसे  हमें  इस  दुनिया  में  लाने  का  श्रेय  जाता  हैै । आशा  करती  हूँ  एक  कोशिश  तो  सभी करेंगें । धन्यवाद ।

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

बच्चे

          बच्चे  -  हमारा भविष्य  या  प्रयोगशाला  का  कोई  जीव?  किसी  भी  व्यक्ति के  जीवन  का  सबसे  सुखमय , आनंदित  तथा  आश्चर्यमिश्रित  प्रसन्नता  का  पल  वह  होता  है  जब वह  अपने  नवजात  शिशु  को  अपनी  गोद  में  लेता  है । माँ  अथवा  पिता  बनने  का  वह  सुख शायद  जीवन  में  फिर   कभी  अनुभव  नहीं  किया  जा  सकता । परन्तु  अपने  चिरपरिचित  स्वभाव  के  अनुसार  शीघ्र  ही  वह  शिशु  अपने  आनन्दमयी  प्रारूप के  बदले  हमें  एक  ऐसा  जीव  दिखाई  देने  लगता   है  जिसमें  अपना  कोई   गुण  नहीं  है ।  हमें  ही  उसे  सुधार  कर , ठोक -पीट  कर  एक  अच्छा  और  काबिल  इंसान बनाना  है ।
          
          पहली  बार  आँख  खोलने  से  लेकर  पहली  बार  माँ  बोलने  तक  हम  हजारों  बार  उसकी  तुलना  इस  दुनिया  के जाने - अनजाने  हर  एक  से  कर  चुके  होते  हैँ । बच्चे   के  थोड़े  बड़े  होकर  प्ले - स्कूल  के  पहले दिन  से  ही  उससे  आइंस्टीन , कल्पना  चावला , साइना नेहवाल , इंदिरा गाँधी ,सचिन तेंदुलकर  और  शाहरुख़  खान  जैसे  महान  अथवा नामी  और  धनी  व्यक्तियों  की  तरह  बनने  की  उम्मीद  लगा  ली  जाती  हैँ  और  हम  पूरी  लगन  से  उसे  उसी  रास्ते  पर  धकेलने  में लग  जाते हैं ।           

                'बच्चा ' अपने  आप  में  एक  भिन्न  व्यक्तित्व  होता  है ।  उसकी  अपनी  अलग  पहचान, रूची , अथवा  विशेषता  हो  सकती  है । किसी  कड़वे  कैप्सूल  की  तरह  यह  बात  हमारे  गले  के  नीचे  ही  नहीं  उतरती  ।  बच्चे  पालने  पर  लिखी  विशषज्ञों  की  पुस्तकों  से  लेकर  अपने  बड़ों और  मित्रों  तक  से  प्राप्त  ज्ञान  उस मासूम  पर आजमाने  लगते  हैं। सच  तो  यह  है  कि  प्रत्येक  बच्चा  हमें  अभिभवक  बनना सिखाता  है । हम  अपने  बच्चे  के  पैदा  होने  से  लेकर  उनके  बच्चे  पैदा  होने  तक  प्रतिदिन   नया  अनुभव  प्राप्त  करते  हैं ।  जैसे  हर  बच्चा अलग  होता  है , वैसे  ही  उसे  पालने  का  तरीका   भी  अलग  होता  हैै ।        

          जब  बच्चा  चलना  सीखता   है  और  गिरने  लगता  हैै  तो  हम  उसे  दायें  हाथ  से  संभालें  या  बायें  हाथ  से ,  यह  हम  किसी  किताबी  ज्ञान  के  आधार  पर  तय  नहीं  करते  बल्कि  अपने  अनुभव  तथा  विवेक  के  आधार  पर  करते  हैं  ।  बच्चा  क्या  खाना ,  खेलना , सीखना , या  बनना  चाहता  है  ये  हम  उसे  बताने  की  बजाय  सही -गलत  समझाकर  तय  करने में  मदद  करें  तो  निश्चित  ही  भविष्य  में हमें  सचिन ,साइना  या  अम्बानी  मिले  या  न मिले , लेकिन  प्रेम , आत्मविश्वास  और  संवेदनशीलता  से  भरा  एक  व्यक्ति  जरूर  मिलेगा /मिलेगी  जो  सफल  होकर  न  केवल  आपको  गौरान्वित  करेगा  बल्कि  समाज  का  भी  एक  उत्तरदाई  नागरिक  बनेगा । हमें  तथा  हमारे  देश  को  ऐसे  नागरिकों  की  आवश्यकता शायद  पहले  से  अधिक  है । शायद  आप  भी  मुझसे  सहमत  होंगे । नमस्कार !

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

बेटी

आज सुबह का अखबार खोलते ही सबसे पहले मेरी नजर "बेटी बचाओ " के नारे पर पडी़। बेटी शब्द पढते ही लाड, प्यार, ममता, चंचलता,रूठना,मनाना,जि़द्द,रौनक,और जिम्मेदारी जैसी कई भावनाएं अनायास ही मन में कौंध गई। घर में बेटी का होना सम्पूर्णता का  एहसास दिलाता है।आज के युग में जहाँ बेटियां हर उस काम में अपनी योग्यता सिद्ध कर रहीं हैं जहाँ उनके पहुँचने की कल्पना भी कुछ समय पहले असंभव थी ,वहीं आज भी  कुछ  परिवारों में  बेटे की महत्ता का गान हमें कई पीढ़ियां पीछे जाने का  एहसास कराने  लगता है ।
  अपनी  बेटी  से  रिश्ता मानो  आज  से  नहीं बल्कि  खुद  के  बेटी  होने  के  समय से  ही  है । मैंने अपने परिवार  में बेटों  के  बीच  अधिक महत्वपुर्ण व्  मूलयवान होने  का  अहसास बचपन से  ही  किया  है । जिसके  लिए  मैं  आजीवन  माँ  की  अहसानमंद  रहूँगी । शायद  इसीलिए मुझे बच्चों  में लड़कियाँ  अधिक  प्रिय  रहीं  हैं ।  उन्हें  सजाना , सवांरना ,  पढ़ाना ,  गीत  सिखाना और गुडि़या की  तरह  घर भर में  नचाना  मेरा  सबसे  प्रिय  शग़ल  था । बेटियाँ  जितनी  संवेदनशील  होती  हैं ,  बेटे चाह कर भी बराबरी नहीं  कर  सकते ।
                          बेटी  शब्द  एक  जि़म्मेदारी  का  एहसास भी  दिलाता  हैं । चाहे  वह संस्कारों  के  आधार पर हो या  एक  अभिभावक  के  रुप  में  हो । कहा  जाता  है  कि  कन्यादान  सबसे  बड़ा  दान  होता है । यदि आपने यह  दान  लिया  है  तो  इसे  दिए  बिना  आपको  मोक्ष  प्राप्त  नहीं  हो  सकता । इसलिए  आपको  जीवन  में  एक  बार  यह  दान  अवश्य  करना  चाहिए । वहीं  द्दूसरी  ओर  यह  एक  सामाजिक  कर्तव्य  भी  है । इसे  यदि  सही  तरह  से  न  निभाया  जाये तो  भविष्य  में  एक  उच्च  समाज  की  कल्पना  भी  नहीं  की  जा  सकती । जो  बेटी  स्वयं  बोझ  बनकर  पली - बढ़ी  हो , वह  सवयं  कैसे  एक  ऐसे  परिवार  का  निर्माण  कर  सकेगी  जिसका  हर  सदस्य  समाज  व  देश  के  लिए  एक  निर्माता  सिद्ध  हो  सके  बोझ  नहीं।  लाड़ - प्यार  से  पली  बेटि  जो  अपने  माता -पिता  के लिए  गर्व रही  हो  ,वही  आगे  जाकर  एक  शालीन , पढ़े -लिखे , संस्कारी , जिम्मेदार  परिवार  का  निर्माण  कर  सकेगी  जो  एक  नए , स्वच्छ  तथा   उन्नतिपूर्ण  समाज  का  हिस्सा  होगा । उन्हें  बेटों  से  कम  न  आंककर  हम  उन्हें  महत्वपूर्ण  होने  का  एहसास  कराते  हैं  तो  हम  भविश्य  सुधारने  की  नींव  भी  रखते  हैं । इसलिए  मेरी  बेटी  मेरे  जीवन  का  उद्देश्य  भी  है  तथा  ज़िम्मेदारी  भी ।  उसकी  हँसी  से  घर  में रौनक  ही  नहीं  होती , बल्कि   घर  की  उदासी  भी  दूर  होती  है  ।  वह  हमारे  परिवार  का  एक  अनमोल  रत्न  है , जिसके  बिना  यह  घर  अधूरा  है । आशा  है  आप  भी  अपनी  बेटी   के  बारे  में  सोचकर  मेरे  विचारों  से  सहमत  होंगे । एक  सकारात्मक  सोच  तथा  कदम  की  अभिलाषा रखते  हुए  विदा लेती  हूँ , नमस्कार ।